इश्क में पीट के आने के लिए काफी हूँ मैं निहत्था ही ज़माने के लिए काफी हूँ हर हकीकत को मेरी, खाक समझने वाले मैं तेरी नींद उड़ाने के लिए काफी हूँ एक अख़बार हूँ, औकात ही क्या मेरी मगर शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ ~ राहत इंदौरी