“जिन्दगी का गहना”
खेलने को मिलते खिलोने
बहोत अच्छा लगता था खेलना,
चला गया वो बचपन
जिसमे मुझे था हंमेशा रेहना,
बचपन गया पढाई पुरी की
आ गया जिम्मेदारी निभाने का गहना,
जिम्मेदारी पुरी करने चला था
कमाने को जाता बनाके बिस्तर को अपना गहना,
बचपन भी गया, जवानी भी गई,
आ गए दिनों जिसमे था लडखडाते हुए ही चलना,
जिन्दगी यूही चलती गई
समझ नहीं आया की क्या मुझे है करना,
जिओ जिन्दगी ऐसे की
नहीं दूसरो पर अपना रो़फ झडना,
प्यार से जिओ, रखो अम्न कायम
यही है सच्चे जिवन का एक गहना…
– संकेत व्यास (इशारा)






























