कलर्स की पौराणिक महागाथा ‘शिव शक्ति – तप, त्याग, तांडव’ अपने सबसे विषादपूर्ण अध्याय की ओर बढ़ रहा है—महादेव और पार्वती का दुखदायी विरह। एक तूफान उठता है, अंधकार समस्त लोकों पर छा जाता है, और स्वयं भाग्य भी कांप उठता है, क्योकि शिव एक अकल्पनीय बलिदान देने के लिए विवश हो जाते हैं। वह देवी पार्वती के सामने ऐसा सत्य प्रकट करते हैं, जो उनके दिल को चूर-चूर कर देता है—शिव ने उनसे छल किया है! चारों ओर विनाश की ज्वाला भड़क उठती है, लेकिन सबसे भयानक तूफान पार्वती के दिल में उठता है। शुक्राचार्य और दित की दुष्ट साज़िश ने शिव के समक्ष कोई और विकल्प नहीं छोड़ा।
सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए, महादेव को अपना सबसे बड़ा बलिदान करना होगा। जिस प्रकार कभी सती खंड- खंड हो गई थीं, वैसे ही अब शिव को स्वयं को बारह दिव्य ज्योतिर्लिंगों में विलीन करना होगा—हर ज्योतिर्लिंग उनकी अनंत शक्ति का प्रतीक बनेगा।
इससे पहले कि पार्वती उन्हें रोक पातीं, शिव का स्वरूप प्रचंड ज्योति किरणों में बिखर जाता है, और आकाश को चीरते हुए पूरे ब्रह्मांड में विलीन हो जाता है। पार्वती व्याकुल होकर उनकी ओर हाथ बढ़ाती हैं, चाहती हैं कि उनके अस्तित्व का एक अंश ही पकड़ लें—लेकिन शिव जा चुके हैं। परंतु पार्वती हार मानने वालों में से नहीं हैं। विरह का दुख भले ही उन्हें तोड़ दे, लेकिन प्रेम उन्हें फिर से उठने की शक्ति देता है। अगर महादेव स्वयं ज्योतिर्लिंग बन गए हैं, तो वह सृष्टि के छोर तक जाकर भी उन्हें खोजेंगी। हर कदम पर वह भाग्य को चुनौती देंगी, दुष्ट असुरों का
संहार करेंगी, और नश्वर सीमाओं से परे जाकर अपने शिव से पुनर्मिलन करेंगी। यह कोई साधारण वियोग नहीं है—यह पार्वती के प्रेम और भक्ति की सबसे कठिन परीक्षा है।





















