मुझे बारिश अच्छी लगतीं हैं
पिताजी को भी अच्छी लगती थी।
हम दोनों कविता लिखतें है ।
किन्तु
बारिशके आनेसे पूर्व ही पिताजी
तैयार हो जाते थे
पूरे घरका चक्कर लगते थे
छत पर जाकर भी देख लेते थे
कहीं कुछ अटका फँसा तो नहीं
पानी निकलने के मार्ग में !
हों तो ख़ुद सफ़ाई करते थे ।
हम सबको समय पर घर आने का आदेश था ।
दरवाज़े के पास बैठे देखते रहते थे
कभी रास्तेको , कभी दिवार पर लगी घड़ी को।
समय पर आनेवाला भी
उन्हें देर से आया लगता था ।
फिर सब साथ मिलकर पकौड़े खाते थे ।
रात सोनेसे पहले वो देख लेते थे
फ़ानूसमें मिट्टी का तेल है कि नहीं,
दियासलाई पास ही में है ना ।
इस पर भी वो टार्च और बैटरी भी चैक कर लेते
फिर सोते ।
रात बारिश आती तो उठकर देखते कि
सभी खिड़कियाँ बंद है ना ,
जो कि सोने से पहेले ख़ुद बंद करके सोते थे।
आज पहेली बारिश है।
मैंने भी वो सब कुछ किया ।
फिर मन ही मन मुस्कुराया..
हंसी की झलक होंठों पर भी आ गई होंगी ,
तो पोती देखकर हैरान !
क्या हुआ है उसके काकु को ?
वह मुझे “ काकु “ बुलाती है ।
मैं बिस्तर पर पड़ा सोचता हूँ ,
कमाल है !
मैं भी वो सब कर रहा हूँ
जो पिताजी करते थे !
पिताजी ने तो कोई वसीयत नहीं बनाया ,
कहते थे, मेरा जो कुछ है ,
मिलेगा तुम सबको ही
और
थोड़ा थोड़ा मैं भी ।
आज इसे जिनेटिक्स कहते है ।
सोचता हूँ
मैं पिताजी जैसा बन गया हूँ
या पहले से ही
पिताजी रहते थे मुझमें ?
तब हम हँसते थे,
पिताजी को देखकर ।
आज बिटिया हँसती है ।
और मैं भी मुस्कुराता हूँ
ना जाने क्या सोच कर !
यूँ ही हँसते होंगे
पिताजी भी !
पिताजी याद आ गये ,
आज पहली बारिश में ।
– तुषार शुक्ल ।





















