दी दस्तक बेवज़ह किसने? यहाँ पर कौन आया था?
वहां पे क्या अभी आये थे तुम? या कोई साया था?
नहीं खलती कमी बारिश की चौखट पे हमारी अब,
कफ़न को मेरे यूं गुस्ताख़ आंखों ने नहलाया था!
तवज्जु मेंने तुम्हारी मुहब्बत को दी हैं इतनी,
वही है दफ्न हम तू जिस जगह दफना के आया था!
हमारी कब्र पे जब फूल रखके जा रहे थे तुम,
लगा था कि त’आरुफ करने आया वो पराया था।
छूटी थी मेरी हर साँसे बिना तेरी तजल्ली के,
इस धड़कनने भी तेरा नाम फिर से गुनगुनाया था।
शिकायत सुनके भी मेरी लगे हसने सितमगर यूँ,
चलो तन्हाइयों ने मेरी तुम्हें तो हसाया था!
गिले मिटने लगे सारे, वफ़ा दस्तक लगीं देने,
जो आंखें बरसी जन्नत पे गले तुमने लगाया था।
आरती रामाणी “ऐन्जल”





















